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नाफ़्टा के तहत हर साल तक़रीबन एक खरब अमरीकी डॉलर का व्यापार होता

स नए समझौते में बौद्धिक संपदा अधिकार, डिजिटल ट्रेड और निवेशकों से जुड़े विवादों के लिए प्रस्ताव शामिल किए गए हैं.
अमरीका ने इस मुद्दे पर कहा है कि मेक्सिको के साथ हुए शुरुआती समझौते में दोनों देश इस बात पर राज़ी हुए हैं कि टैक्स फ़्री दर्जा हासिल करने के लिए किसी भी उत्पाद का 75 फ़ीसदी हिस्सा दो देशों में बनना चाहिए जो कि वर्तमान संधि से ज़्यादा है.
कारों को लेकर ये तय हुआ है कि प्रत्येक कार का 40 से 45 फ़ीसदी हिस्सा उन कामगारों द्वारा बनाया जाना चाहिए जो कि कम से कम 16 डॉलर कमा रहे हों.
इस प्रस्ताव का उद्देश्य ये है कि कंपनियां मेक्सिको के उन क्षेत्रों में अपने प्लांट लेकर जाएं जहां पर मज़दूरी दर कम है.
अमरीका ने कहा है कि ये समझौता आने वाले 16 सालों तक ठीक रहेगा.
दोनों देश इस बात पर राज़ी हुए हैं कि हर छह सालों में इस समझौते की समीक्षा की जानी चाहिए.
लेकिन इस समीक्षा के साथ स्वत: निरस्तीकरण का जोख़िम नहीं होगा जैसा अमरीका ने प्रस्ताव दिया था.
अमरीका में आमतौर पर खुले व्यापार के पक्ष में रहने वाली रिपब्लिकन पार्टी ने व्हाइट हाउस को इस समझौते पर दस्तख़त करने के लिए दबाव बनाया है.
इसके साथ ही ये तर्क दिया गया है कि खुली हुई सीमाओं से अमरीकी किसानों को बहुत फ़ायदा होता है.
टेक्सस से आने वाले सीनेटर जॉन कॉर्निन कहते हैं कि ये एक सकारात्मक क़दम है.
वह कहते हैं, "अब हमें ये सुनिश्चित करना है कि फ़ाइनल समझौते में कनाडा भी शामिल हो और उसे द्विपक्षीय समर्थन हासिल हो."
यूएस चेंबर ऑफ़ कॉमर्स अमरीका में एक मज़बूत व्यापारिक समूह है जो कि नाफ़्टा का समर्थन करता है.
इस समूह ने भी समझौते में तीनों देशों के शामिल होने की बात कही है.न और अमरीका के आपसी टकराव में भारत को फ़ायदा मिल सकता है. वाणिज्य विभाग की एक स्टडी के अनुसार चीन के कमोडिटी बाज़ार में भारत अमरीका की जगह भर सकता है.
चीन ने अमरीकी उत्पादों पर भारी आयात शुल्क लगा दिया है जिस वजह से अमरीकी सामान काफ़ी महंगे हो गए हैं. ऐसे में भारत के लिए ये मौक़ा है कि वो अमरीकी वस्तुओं की जगह अपने उत्पादों को पेश कर सके.
इस स्टडी के अनुसार भारत कम से कम 100 अमरीकी उत्पादों की जगह अपने उत्पाद को चीनी बाज़ार में पेश कर सकता है.
स्टडी के अनुसार भारत के लिए यह मौक़ा है कि वो चीनी बाज़ार में कपास, बादाम, गेहूं, मक्का और ज्वार को उतारे ताकि अमरीका से खाली हुई जगह को कोई और न लपक ले.
कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी ने पिछले हफ़्ते लंदन में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की तुलना कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से की थी. राहुल की इस तुलना से आरएसएस ने नाख़ुशी जताई थी.
अब आरएसएस अगले महीने तीन दिन का संवाद कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है जिसमें वो वक्ता के तौर पर राहुल गांधी को भी 'आमंत्रित' कर सकता है. आरएसएस का कहना है कि राहुल को समझ नहीं है इसलिए उन्होंने ऐसी तुलना की है.
आरएसएस के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अरुण कुमार ने कहा, ''राहुल ने ख़ुद ही कहा है कि वो भारत को समझने की कोशिश कर रहे हैं. जो अब भी भारत को नहीं समझ पाया है वो आरएसएस को कैसे समझ पाएगा. राहुल गांधी को पहले यह जानने की ज़रूरत है कि मुस्लिम ब्रदरहुड अलग-अलग देशों में क्या कर रहा है.'' आरएसएस इस संवाद कार्यक्रम में सीपीएम प्रमुख सीताराम येचुरी को भी बुला सकता है.

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