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नज़रिया: नीतीश कुमार को प्रशांत जैसे लोग ही क्यों रास आते हैं

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपनी पार्टी जनता दल यूनाइटेड में उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त कर दिया है.
लेकिन नीतीश के इस फ़ैसले से उनकी पार्टी के प्रमुख नेताओं और काडर में एक तरह की असंतुष्टि का भाव देखा जा रहा है.
जदयू के नाराज़ नेताओं में आरसीपी सिंह, संजय झा और बिहार में पार्टी अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह शामिल हैं.
लेकिन पार्टी का एक तबका नीतीश के इस फ़ैसले से ख़ुश नज़र आता है. ऐसे लोगों में पार्टी महासचिव केसी त्यागी और पवन वर्मा जैसे नेता शामिल हैं.
जदयू से जुड़े सूत्रों के मुताबिक़, अब तक पार्टी में नंबर दो के पायदान वाले नेता माने जाने वाले आरसीपी सिंह चौथे पायदान पर खिसक गए हैं. यही नहीं, केसी त्यागी का दर्जा उनसे ऊंचा हो गया है.
पूर्व नौकरशाह और नीतीश कुमार की जाति वाले आरसीपी सिंह और वशिष्ठ नारायण सिंह को जदयू के उन नेताओं में गिना जाता है जिन्हें बीजेपी के क़रीब माना जाता है. संजय झा तो खुले तौर पर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली से अपने संबंधों का बखान किया करते हैं.
लेकिन नीतीश कुमार जिस तरह जदयू को चला रहे हैं उससे पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतुष्टि का भाव देखा जा रहा है.
जदयू के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, "नीतीश कुमार पहले भी इसी तरह पार्टी चलाया करते थे, लेकिन अब जबकि उनका राजनीतिक रसूख़ कम हो गया है तो उन्हें अपनी रणनीति बदलने की ज़रूरत है."
लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं है जब नीतीश कुमार ने एक ऐसे नेता को पार्टी पर थोपा है जिसकी छवि राज्यसभा में जाने वाले नेताओं की होती है.
इससे पहले पूर्व नौकरशाह एनके सिंह जो कि इस समय 15वें वित्त आयोग की अध्यक्षता कर रहे हैं, को भी पार्टी में शामिल करके राज्यसभा सदस्य बना दिया गया था. उस समय कयास लगाए जाते थे कि वह पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे.
लेकिन इसके कुछ समय बाद ही उनकी और शिवानंद तिवारी की नीतीश कुमार से दूरियां सामने आ गईं. फिर नीतीश कुमार ने दोनों नेताओं को एक तरह से पार्टी से बाहर कर दिया गया.
इसके बाद भूटान के तत्कालीन राजदूत पवन वर्मा और नीतीश कुमार के बीच नज़दीकियां इतनी बढ़ीं कि उन्होंने जदयू में शामिल होने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी.
इसके बाद उन्हें भी सलाहकार बनाया गया और नीतीश सरकार में उन्हें एक मंत्री का दर्जा दिया गया.
इसके साथ ही उन्हें राज्यसभा सदस्य भी बनाया गया.
लेकिन नीतीश के एनडीए में शामिल होने के बाद पवन वर्मा ने उनस दूरियां बढ़ानी शुरू कर दी. उन्होंने कई मौक़ों पर नीतीश कुमार की आलोचना भी की.
लेकिन प्रशांत किशोर के पार्टी में शामिल होने से ठीक पहले पवन वर्मा पार्टी में एक बार फिर सक्रिय हो गए.
ये कहा जाता है कि पवन वर्मा ने प्रशांत किशोर को पार्टी के क़रीब लाने में एक अहम भूमिका निभाई थी.
एक दूसरे पूर्व नौकरशाह आरसीपी सिंह भी उस दौर से नीतीश कुमार के क़रीब रहे हैं जब नीतीश वाजपेयी सरकार के दिनों में रेल मंत्री हुआ करते थे.
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद आरसीपी सिंह आईएएस की नौकरी छोड़ जदयू में शामिल हुए और राज्यसभा के टिकट पर संसद पहुंच गए. उन्हें भी पार्टी में नंबर दो के स्तर का नेता माना जाता था.
लेकिन प्रशांत किशोर को जदयू का उपाध्यक्ष बनाया जाना अहम माना जाना चाहिए क्योंकि उन्हें नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी माना जा रहा है.
हालांकि, बिहार की राजनीति पर नज़र रखने वाले इसे आश्चर्य के साथ देख रहे हैं कि नीतीश उन लोगों पर इतना मोहित क्यों हो जाते हैं जिन्होंने न कभी कोई चुनाव लड़ा और न ही कोई चुनाव जीता.
ऐसा लगता है कि वो किसी जननेता को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं.
लेकिन उनका ये रवैया पार्टी के लिए नुक़सानदायक हो सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार की राजनीतिक साख भी कम हो रही है. रशांत एक चुनावी रणनीतिकार होने के साथ-साथ कांग्रेस-बीजेपी के साथ जदयू की सांठगांठ में एक भूमिका अदा कर सकते हैं.
वो जदयू के मुखिया को कई मौक़ों पर सुझाव दे सकते हैं. नीतीश कुमार को मोदी और शाह से भी जोड़ सकते हैं.
लेकिन उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है और ना ही उनके पास पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ काम करने का अनुभव है. एक राजनेता के रूप में ऐसी ज़िम्मेदारी के लिए वो बिल्कुल नए हैं.
जब बिहार में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हो रहे थे तब प्रशांत किशोर अफ़्रीका में संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए काम कर रहे थे.
कई लोग ये भी मानते हैं कि मीडिया ने साल 2014 में मोदी की जीत और एक साल बाद महागठबंधन के लिए प्रशांत किशोर को ज़रूरत से ज़्यादा श्रेय दे दिया.
दरअसल, दोनों ही बार वह उन पार्टियों के साथ थे जोकि चुनाव जीतने जा रही थीं.
वहीं, दूसरी ओर साल 2017 में वह समाजवादी पार्टी को जीत नहीं दिला सके.
ऐसे में जब उन्होंने देखा कि एक चुनावी रणनीतिकार के रूप में उनकी मांग में कमी आ रही है तो वह जदयू में शामिल हो गए.
लेकिन प्रशांत किशोर शायद ये नहीं जानते हैं कि एनके सिंह, पवन वर्मा, आरसीपी सिंह और संजय झा व्यक्तित्व के मामले में उनसे कहीं आगे हैं.
इसके साथ ही इन लोगों के पास इस देश में काम करने का लंबा अनुभव है. लेकिन इसके बाद भी ये लोग लंबे समय तक नीतीश कुमार के क़रीबी बनकर नहीं रह सके.

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