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वायनाड से चुनाव लड़ना राहुल गांधी का दक्षिण भारत में मास्टर स्ट्रोक: नज़रिया

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी के साथ साथ उत्तरी केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ रहे हैं. उनके यहां से चुनाव लड़ने पर उम्मीद के मुताबिक ही काफी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं.
बीजेपी यह यह कह रही है कि वे हिंदू मतदाताओं से भाग रहे हैं हालांकि 2011 की जनगणना के मुताबिक अमेठी में मुस्लिम आबादी 33.04 फीसदी है, जबकि वायनाड में 28.65 फ़ीसदी मुसलमान हैं.
वहीं वामपंथी दल ये मान रहे हैं कि राहुल गांधी उन्हें चुनौती दे रहे हैं जबकि दस साल पहले बनी इस संसदीय सीट पर कांग्रेस ने अब तक हुए दोनों चुनाव में सीपीआई को हराया है. हालांकि 2014 में कांग्रेस की जीत का अंतर बेहद कम रह गया था.
वहीं कांग्रेस को भरोसा है कि वायनाड से राहुल गांधी के चुनाव लड़ने से केरल के अलावा तमिलनाडु और कर्नाटक की सीटों पर भी साकारात्मक असर होगा.
कांग्रेस के तर्क को आत्म संतुष्टि वाला आकलन कह सकते हैं. क्योंकि वायनाड की सात विधानसभा सीटों में से चार सीटों पर सीपीएम और सीपीएम समर्थित एक निर्दलीय का कब्जा है.
वहीं तमिलनाडु की थानी सीट से एआईएडीएमके ने उप-मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वन के बेटे को उम्मीदवार बनाया है जिनका मुकाबला कांग्रेस के उम्मीदवार ईवीकेएस इलनगोवान है. इलनगोवान पेरियार के पोते हैं.
कर्नाटक के चमराजनगर में कांग्रेस के ध्रुव नारायण मौजूदा सांसद हैं, उन्हें 16वीं लोकसभा के सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले सांसदों में शामिल हैं, वो भी तब जब राहुल गांधी बगल वाली सीट से चुनाव नहीं लड़े थे.
जाहिर है, सच इन सबके बीच कहीं होगा.
ऐतिहासिक तौर पर, गांधी परिवार रायसीना की सत्ता को हासिल करने के लिए दक्षिण में नीचे का रास्ता पकड़ती रही है.
आपातकाल में हार के बाद, इंदिरा गांधी ने संसद में वापसी के लिए 1978 में चिकमंगलूर का रास्ता चुना था, साथ में 1980 में इंदिरा गांधी मेढ़क से चुनाव जीतने में कामयाब रही. 1999 में, उनकी पुत्रवधू सोनिया गांधी ने बेल्लारी से अपनी शुरुआत की थी.
अपनी दादी और मां की तरह, राहुल गांधी ने दक्षिण भारत से चुनाव लड़ने का सुरक्षित रास्ता अपनाया है.
पुलवामा हमले के बाद 'डेली थांती' में एक सर्वे छपा था, जिसमें यह दिखा था कि राहुल गांधी की लोकप्रियता बीते एक महीने में बढ़ी थी जो 41 फीसदी थी, जबकि मोदी की लोकप्रियता 26 फीसदी थी.
एक अन्य सर्वे इंडिया टुडे में प्रकाशित हुआ था, जिसके मुताबिक केरल के 64 फीसदी लोग राहुल गांधी को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं जबकि मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखने वाले लोगों की आबादी 22 फीसदी है.
लेकिन 2019 में कांग्रेस की कहानी में कई और पेंच भी हैं. कर्नाटक अब उतना सुरक्षित नहीं रह गया है, जबकि आंध्र प्रदेश, अब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, दो राज्यों में बंट चुका है और तमिलनाडु किसी बाहरी के लिए अभी भी अनुकूल नहीं रह गया है.
पिछले सप्ताह नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद राहुल गांधी ने कहा, "दक्षिण भारत के लोगों को अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास, को लेकर आरएसएस, बीजेपी और नरेंद्र मोदी से ख़तरा महसूस हो रहा है. मैं दक्षिण भारत के लोगों को बताना चाहता हूं कि मैं उनके साथ खड़ा हूं. कांग्रेस पार्टी उनके साथ खड़ी है."
इसके बाद से कई कांग्रेसी नेताओं ने बताया कि राहुल गांधी की वायनाड से उम्मीदवारी, मोदी सरकार के दक्षिण भारत की उपेक्षा का जवाब है.
कांग्रेसी सांसद शशि थरूर ने द प्रिंट में लिखा है, "केंद्र में बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौर में दक्षिण भारतीय राज्यों और केंद्र सरकार के आपसी संबंध ख़राब हुए हैं. "
वहीं कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरेजवाला ने कहा, "राहुल गांधी उत्तर और दक्षिण भारत के आपसी रिश्तों को मजबूत करेंगे."
दूसरे शब्दों में, जब नरेंद्र मोदी और बीजेपी राष्ट्रवादी राष्ट्रवाद का पैरोकार कर रही है जिसमें मजबूत नेता, मजबूत सीमा और सुरक्षित राष्ट्र की बात कही जा रही है. इसके जवाब में कांग्रेस दक्षिण भारत की क्षेत्रीय अस्मिता को मज़बूत करके वैकल्पिक राष्ट्रवाद के नैरेटिव को बढ़ा रही है.
मोदी लहर पर सवार होने के बाद भी 2014 के चुनाव में बीजेपी को पांच दक्षिण भारतीय राज्यों की 112 सीटों में 20 सीटें हासिल हुई थीं. जिसमें 17 समुद्रतटीय और उत्तरी कनार्टक में हासिल हुए थे. बीजेपी ने इन राज्यों की 67 सीटों पर चुनाव लड़ा था. जहां देश भर में बीजेपी की स्ट्राइक रेट 60 फीसदी थी वहीं दक्षिण भारतीय राज्यों में ये महज 19 फ़ीसदी था.
बीजेपी की सरकार ने बीते पांच सालों में आपसी तालमेल वाले संघीय ढांचे की बात जोर शोर से भले उठायी हो लेकिन उसने दक्षिण भारत को कांग्रेस, वामपंथी दलों और क्षेत्रीय दलों के लिए खुला छोड़ दिया है.
उदाहरण के लिए

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